तेल के खेल

समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ नारा रहे ‘खा गइल रासन पी गइल तेल’ जवना के सुनला का बाद ओह लइकन के उनुके बाप-मतरी भर हीक पाथतो रहलें। उ समयइयो अइसन रहल कि रोवला पर फेर पहिला से बेसी पथाई मिलत रहल । अकसरहाँ पाथे के लोग अलग-अलग मतलब निकालत भेंटा जाला।कुछ लोग एकरा गोबर पाथे से जोड़ देला,उहें कुछ लोग ईंटा पाथे से । दूनो के आपन बरियार उपयोगिता त बड़ले बा,संगही लमहर महातिमो बा। बाक़िर मतारी-बाप के पथाई के एक सूत्रीय उदेश्य रहत रहल, एगो नीमन आकार देहल। अपना संतान के लेके जवन हर मतारी–बाप के चाहत रहेला, ओह घरी ई एगो अजुमावल अस्त्र रहल। जवना के हर मतारी-बाप अपना जिनगी भर बेफिकिर होके परयोग करत रहलें । पथाई चाहे गोबर के होखे भा ईंटा के एगो सुघर आकार उहों देखाला । सबसे पहिले एकर परयोग  कवने काम खातिर भइल रहे, ई एगो शोध के बिषय हो सकत बा। बाक़िर सुघर आकार के लेके कहीं कवनो सक-सुबहा नइखे।सुघरई के परिभाषा अलग-अलग लोगन के अलग-अलग हो सकत बाटे भा होखबो करेला। ओकरा लेके अलग भाव भा सोच होखला के नकारल मोसकिल बा।

ओह घरी लागे वाला नारा में जवने ‘तेल’ के बात रहल, आजु फेर से ओही तेल के फेर से जनम होत देखात बाटे। एगो अंतर जरूर देखा रहल बा, कि अब नवा कोटेदारन में पेट्रोल पम्पो सामिल हो गइल बा। पहिले कोटेदार के माने ‘रासन आ तेल बाँटे वाला’ गाँव-गिरांव के एगो खास मनई से रहे। उ त अबो बा । अब बोतल नई जरूर बा बाक़िर ओहमें राखल जाये वाला चिजुइया पुरनकिये बा। तब वाले तेल के खेल में एगो सरकार के बलि चढ़ गइल रहे आ सरकार के मुखिया के सरकारी घर देखे के पड़ल रहे। सरकारी घर मने तिहाड़ वाला, अपने ई मति बुझब कि सांसद के बँगला भा सरकारी अफसर के बँगला। दूनों सरकारिये होला बाक़िर उहाँ रहे वाला लोगन के अलग-अलग तरह के माला भेंटाला। अब ई बाति अउर बा कि तिहाड़ो से अइला का बाद कुछ लोग कर्तब्य पथ वाले बँगला में जाये के पहिल सीढ़ी मानेला । कर्तब्य पथ वाले बँगलो से कुछ लोग तिहाड़ चहुंपत रहेला। एह दूनों जगहा के भईयापा ढेर लोगन के जानल-पहिचानल बा।

अपने इहाँ एह घरी तेल का संगे-संगे गैसो के खेल चल रहल बा। बाक़िर तेल-गैस के खेला वैश्विक बा । मने अपने इहाँ से बेसी बाहरो ई खेला खूब चल रहल बा। बहरा त· ‘मारे बरियरा रोव· ना दे’ का तरज पर दे दनादन –दे दनादन  चल रहल। सगरे खेलवइयन के आपन-आपन सोवारथ बा। बाक़िर बोलत कुछ अउरिये बाड़न सन। अब ई त सभे के पते बा कि सुरुज के बदरी ढेर देर तलक तोप के ना रख पावेले । मने मन के बाति ओठ से टपकिए गइल। केहू कुछों माने भा मति माने बड़का चौधरी के अपने धुन बा आ उहाँ के डूब के ओह धुन में गा रहल बाड़ें। ओह धुन के सुन के ढेर लोग दम्मी साध लेले बा भा रसता बदलि के मुँह पर ढकनी लगा के निकल गइल बा भा निकले के फिराक में बा। कुछ लोग आपन पल्लो झाड़ लेले बा । बाक़िर चौधिरिया हुरपेटे से बाँव नइखे जात । रहि-रहि के डेरवावतो बा,धमकावतो बा। बाक़िर जे निकलल से निकल गइल । अब लोहार के बरद लेके कोंहार के सत्ती होखला के समय बीत चुकल बा । सत्ती होखे वाला काम त अब लोहरे के करे के पड़ी।

बड़का चौधरी के एगो उनही लेखा उनुका दयादो बाड़ें , उहो दू बरिस से लागल बाड़ें, बाक़िर अब तलक उहों के बाबाजी के ठुल्लू  तक नइखे भेंटाइल। इहे हाल बड़के चौधरी के बा ,महीना भर से लागल बाड़ें । जेकरा-जेकरा के दूनों चौधरी लोग पोंछियावे में लागल बाड़ें,ओहनियों के कम टिर्राह नइखे सन । ओहनियों के जिद्द पकड़ के बइठल बाड़ें सन आ करत आ क़हत कि ‘बांड़ त बांड़े जइहें आ नौ हाँथ के पगहो लेले जइहें’। ओह पगहवा से से उधिरात धुरि में कतना लोग सउना रहल बाड़ें भा गवें-गवें सउनइहें, एहु के समय पर गिनल जाई । दूनों के दूनों चौधरी लोग छनमतरा बाड़ें, भोरे कुछ, दुपहरिया कुछ अउर आ तिजहरिया के ठेकाने नइखे । एही से ढेर लोग एहनी के सुनिके मुस्कियाइयो रहल बा। अब जे मुस्किया रहल बा ओकरा के मुस्कियाये देहीं भा राउर मन होखे त रउवो मुस्किया लेहीं। बहत गंगा में हाथ धोवे के चलन पुरान बा, हाथो धो लेहीं।

हिचकोला दूनों चौधरी लोग कम नइखे खात । गाहे-बगाहे थुरइयो रहल बा लोग बाक़िर दरद मस्त होके पी रहल बा। एक के टोपी दोसरा के पहिरावे के फेरो में पड़ल बाड़ें चौधरी लोग। हाय रे जमाना केहू टोपी पहिरे ला तइयारे नइखे होत। उहो लोग ठेंगा देखा रहल बा जेकरा संगे पहिले खूब गलबहियाँ करत रहलें लोग । मने ले उलटबासी आ दे उलटबासी चल रहल बा। कोसा–कोसियो कम नइखे।  अब जवन बा तवन त हइये बा, एही में सभे बा। रहलो मजबूरी बा, चाहियो के भागब त केने। घरे में चुल्हा त जलावहीं के बा । हँस के भा रो के चौधरी लोगन के चकरी के संगे घुमही के पड़ी।  हम त घुमिये रहल बानी आ रउवा अब देखीं कि का करे के बा।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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